ख़ुशी
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
सोमवार, 29 अगस्त 2016
बुधवार, 17 अगस्त 2016
गुरुवार, 30 जून 2016
मन परिन्दा
📝बदला हुआ समां है बदला हुआ है मन
कुछ बदला हुआ दिल भी है बदली हुई धड़कन भी
नई सी चाह भी है कुछ नये अरमान भी
ख्वाबों को जी लेने की चाह भीहै तो इक तड़पन भी
उड़ने को मन परिन्दा बेताब है........
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नई सी चाह भी है कुछ नये अरमान भी
ख्वाबों को जी लेने की चाह भीहै तो इक तड़पन भी
उड़ने को मन परिन्दा बेताब है........
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016
दिखावा
📝दुनियादारी बदल गयी है सब दिखावा हो चुका है !ज़माने के साथ बदलाव ठीक है, पर ज्यादा दिखावा,इतना भी अच्छा नहीं।
आज आप कितने भी स्मार्ट क्यों ना हो पर आपने चलन के हिसाब से कपड़े नहीं पहने तो......
ये भी सच है आज का कि पैरो से सर तक ब्रांड है तो लोग आपको देखेंगे वर्ना...............doesn't matterआप कौन हो, क्या हो,काले या गोरे हो! आज सबसे पहले हर किसी की नजर बंदे के चेहरे पर जाती है और उसके बाद नीचे पैरो पर...सब जगह शो होना जरुरी है ::और तो और अगर कान पर लगा फ़ोन महँगा नहीं तो...
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ये भी सच है आज का कि पैरो से सर तक ब्रांड है तो लोग आपको देखेंगे वर्ना...............doesn't matterआप कौन हो, क्या हो,काले या गोरे हो! आज सबसे पहले हर किसी की नजर बंदे के चेहरे पर जाती है और उसके बाद नीचे पैरो पर...सब जगह शो होना जरुरी है ::और तो और अगर कान पर लगा फ़ोन महँगा नहीं तो...
वो
📝दर्द को समेटे हुये रहती है वो
न जाने कहाँ से हिम्मत लाती है
न अपनों में कहना
न अपनों से सुनना
सीने में समा रखना 'उदासी'
जाने कहाँ से हिम्मत लाती है वो
ख़ुशियाँ आतीं भी हैं तो
नीरस बन कर ...
रस भरना,खोना,बनना 'मधु'
जाने कहाँ से हिम्मत लाती है वो....
#वो#
न जाने कहाँ से हिम्मत लाती है
न अपनों में कहना
न अपनों से सुनना
सीने में समा रखना 'उदासी'
जाने कहाँ से हिम्मत लाती है वो
ख़ुशियाँ आतीं भी हैं तो
नीरस बन कर ...
रस भरना,खोना,बनना 'मधु'
जाने कहाँ से हिम्मत लाती है वो....
#वो#
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016
बगिया के फूल
📝यादों की कोंपलें फूट आईं हैं
ख़्वाबों की कलियाँ खिलने लगीं हैं
शाख़ों पर तस्वीरें नज़र आने लगी हैं
फिर आया मौसम खिलने -खिलाने का
ख़्वाबों की कलियाँ खिलने लगीं हैं
शाख़ों पर तस्वीरें नज़र आने लगी हैं
फिर आया मौसम खिलने -खिलाने का
#बगिया के फूल#
शनिवार, 23 जनवरी 2016
अकेलापन
📝अक्सर अकेलेपन का बोझ भी बढ़ता ही चला जा रहा था शाम काट खाने को दौड़ती थी ......
जिनका कोई वजूद न था,वो ही हम पर भावी होने लगे !
.... अब तो ; अकेलापन दोस्त बनता जा रहा है! हमें हरतरह के तौर-तरीको से लेकर इंसान की पहचान तक कराना सिखाने लग गया है ।
.. देखा
फिर--------
Life में कुछ भी हो सकता है ..
...दीवारें दोस्त हो गई शामें बात करने लगींऔर अकेलापन सलाहकार.....
सलाह यह.... अपना शौक़ पूरा करो .... सपने बुनो.... यादें संजो डालो ....
जिनका कोई वजूद न था,वो ही हम पर भावी होने लगे !
.... अब तो ; अकेलापन दोस्त बनता जा रहा है! हमें हरतरह के तौर-तरीको से लेकर इंसान की पहचान तक कराना सिखाने लग गया है ।
.. देखा
फिर--------
Life में कुछ भी हो सकता है ..
...दीवारें दोस्त हो गई शामें बात करने लगींऔर अकेलापन सलाहकार.....
सलाह यह.... अपना शौक़ पूरा करो .... सपने बुनो.... यादें संजो डालो ....
गुरुवार, 21 जनवरी 2016
सर्दी
कुछ दिन पहले सर्दी रानी को निमन्त्रण भेजा था:
हेसर्दी रानी .......कहाँ गुम हो गई तू
न कोई ख़ैर-ख़बर न कोई संदेश
कहाँ छुप गई तू .....ढूढों रे ढूढों.....
न कोहरा न पाला
न भावे धूप, नसुहाये गर्म कपड़े
रज़ाई की गुदगुदी में भी चैन न आवे
दिस्मबर निकला जनवरी आया
पर अबके तू न आई!
याद तेरी बहुत सताये ... मान जा. कुछ दिनों के लिये ही आजा.......
हेसर्दी रानी .......कहाँ गुम हो गई तू
न कोई ख़ैर-ख़बर न कोई संदेश
कहाँ छुप गई तू .....ढूढों रे ढूढों.....
न कोहरा न पाला
न भावे धूप, नसुहाये गर्म कपड़े
रज़ाई की गुदगुदी में भी चैन न आवे
दिस्मबर निकला जनवरी आया
पर अबके तू न आई!
याद तेरी बहुत सताये ... मान जा. कुछ दिनों के लिये ही आजा.......
अब स्वागत है सर्दी का::::
हे सर्दी रानी
आ हीं गई
! सुस्वागतम् !
भाव खा रही थी न ...
रहा नहीं गया न...
दनदनाती हुई,मोटा सा बादलों का शॉल ओढ़े हुये,
नाराज़ कर,सूरज को मजबूर होकर आ ही गई हो तो
.......कुछ दिन रह जाना
समय और मौसम की माँग है ........ हम तो क़ायल हैं ही
आ हीं गई
! सुस्वागतम् !
भाव खा रही थी न ...
रहा नहीं गया न...
दनदनाती हुई,मोटा सा बादलों का शॉल ओढ़े हुये,
नाराज़ कर,सूरज को मजबूर होकर आ ही गई हो तो
.......कुछ दिन रह जाना
समय और मौसम की माँग है ........ हम तो क़ायल हैं ही
मंगलवार, 19 जनवरी 2016
सीख
सुबह बालकनी में चाय पी रही थी कि एक चिड़िया उड़ती चली आई और चीं-चीं करते हुये फुदकने लगी! मैं उसके करतब का मज़ा लेने लगी तभी उसकी चीं चीं तेज़ हो गई, वो इधर से उधर चक्कर काटने लगी मानो कुछ ढूँढ रही हो परेशां होने लगी मैं समझ नहीं पा रही थी क्योंकि मैं मज़े ले रही थी.....मैंने कैमरा हाथों में लिया था ....वो उड़ गई! मैं मायूस हो गई कयोंकि बहुत महत्वपूर्णपल कैमरे से छूट गया था पर पलक झपकते ही वो फिर आ गई और चीं चिल्लाने लगी ध्यान दिया --- वो एक गमले के पास ही चिल्ला रही थी देखा तो पाया नन्हा सा जीव जो शायद २-४ घंटों का ही था मनीप्लांट की बेल में फँस कर रह गया था ! जैसे ही मैंने बेल को खीचं कर उस जीव को निकालने की कोशिश की -- माँ की चिल्लाहट कम हो गई, पर यह क्या:: जीव निष्प्राण था न हिलजुल न आवाज़! माँ भी देखती रह गई..........एक चुप्पी.... ख़ामोशी सी पसर गई..........
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... सोचती रह गई ...... काश ..........कैमरा न ढूँढ कर उस दृश्य को समझने की कोशिश करती.. ........ नन्हें जीव के प्राण बच जाते .... माँ भी दुआयें देती .......
इसी तरह दुर्घटना होने पर दर्शक न बन सहायक बन जायें तो........
... सोचती रह गई ...... काश ..........कैमरा न ढूँढ कर उस दृश्य को समझने की कोशिश करती.. ........ नन्हें जीव के प्राण बच जाते .... माँ भी दुआयें देती .......
इसी तरह दुर्घटना होने पर दर्शक न बन सहायक बन जायें तो........
रविवार, 17 जनवरी 2016
पतंग
आसमान में रंग बिरंगी पतंगें नज़र आ रही थीं---- खुश, मस्त,उन्मुक्त सी उड़ी चली जा रही हवा में पंखफैलाये इधर से उधर पेंच लगाती हुई !पर जैसे ही उसकी डोर खिंचीं :होश आया कि वो एक डोर से बंधी है उसकी डोर किसी के हाथ में है : ढील दी तो पेंच का डर, कसी तो कटने का और यह गई वो गई .....कोई ठिकाना नहीं....या फिर किसी और डोर का साथ ....... पर जानती है -- अंत में कचरे में जानाहै...
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शनिवार, 9 जनवरी 2016
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