ख़ुशी

ख़ुशी

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

मैं

मैं कुछ इस तरह से रहूं -::

स्वाद की तरह लोगों की यादों मे
नमक की तरह जरूरत बनकर
पानी की तरह घुल -मिल जाऊं
सुख-दुख में 

और दुनिया रहे मेरे आसपास मां की तरह. ---नीलम 

मन

हमें कोई संतुष्ट नहीं कर सकता, मुझे तो लगता है ईश्वर भी नहीं !
 क्योंकि हमारा  मन  भटकता है  सुनता सबकी है पर  करता अपने मन की है!  हम किसी चर्चा में  हो या गोष्ठी  में , सुनते हम ध्यान से हैं और ऐसे लगता है मानो आज से ही हम चर्चित  बात मान लेंगे या फिर उन सुनी बातों को जीवन में उतार  लेंगे लेकिन व्यवहारिक जीवन में आते ही न जाने हमारी सोच को क्या हो जाता है कि गिरगिट भी शरमा जाये  हमारे रंग बदलने की कला से।जीवनयापन, अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने और आगे निकलने की अंधी दौड़ में सब कुछ भूला कर अपने आपको  झोंक देते हैं !