ख़ुशी

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शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

मन

हमें कोई संतुष्ट नहीं कर सकता, मुझे तो लगता है ईश्वर भी नहीं !
 क्योंकि हमारा  मन  भटकता है  सुनता सबकी है पर  करता अपने मन की है!  हम किसी चर्चा में  हो या गोष्ठी  में , सुनते हम ध्यान से हैं और ऐसे लगता है मानो आज से ही हम चर्चित  बात मान लेंगे या फिर उन सुनी बातों को जीवन में उतार  लेंगे लेकिन व्यवहारिक जीवन में आते ही न जाने हमारी सोच को क्या हो जाता है कि गिरगिट भी शरमा जाये  हमारे रंग बदलने की कला से।जीवनयापन, अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने और आगे निकलने की अंधी दौड़ में सब कुछ भूला कर अपने आपको  झोंक देते हैं !

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