ख़ुशी

ख़ुशी

रविवार, 17 जनवरी 2016

पतंग

आसमान में रंग बिरंगी पतंगें नज़र आ रही थीं---- खुश, मस्त,उन्मुक्त सी उड़ी चली जा रही हवा में पंखफैलाये इधर से उधर पेंच लगाती हुई !पर जैसे ही उसकी डोर खिंचीं :होश आया कि वो एक डोर से बंधी है उसकी डोर किसी के हाथ में है : ढील दी तो पेंच का डर, कसी तो कटने का और यह गई वो गई .....कोई ठिकाना नहीं....या फिर किसी और डोर का साथ .......  पर जानती है -- अंत में कचरे में जानाहै...
.
.
.
लेकिन उससे पहले आसमान छू लूँ 

शनिवार, 9 जनवरी 2016

सर्दी

हे सर्दी रानी .......कहाँ गुम हो गई तू 
न कोई ख़ैर-ख़बर न कोई संदेश
कहाँ छुप गई तू .....ढूढों रे ढूढों.....
न कोहरा न पालान भावे धूप, नसुहाये गर्म कपड़े 
रज़ाई की गुदगुदी में भी चैन न आवे 
दिस्मबर निकला जनवरी आया
पर अबके तू न आई!
याद तेरी बहुत सताये ... मान जा. कुछ दिनों के लिये ही आजा........

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

नव वर्ष

मान मिले सम्मान मिले,
             खुशियों का वरदान मिले.
क़दम-क़दम पर मिले सफलता,
              डगर-डगर उत्थान मिले.
सूरज रोज संवारे दिन को,
            चाँद मधुर सपने ले आये,
हर पल समय दुलारे आपको
           सदियों तक पहचान मिले

Happy New Year 2016

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

मन

मन तो है मेरा ही पर
मेरे पास नहीं
न  जाने कहां भटकता रहता है
जहां चाहे चल देता है
रहूं ताकती इसे सदा
कब यह भटक जाए
कब यह बिगड़ जाए
कब यह सुख लाए
कब यह दुख दे जाए
इसी लिए मुझे अवकाश नहीं,,,,,,चैन नहीं

शनिवार, 13 जून 2015

यादें

वो मीठी -मीठी सी सुबह,
बादलों से घिरे पहाड़ ,
 ठंडी ठंडी फुहार, सफ़ेद धुँध की चादर
मनमोहक द्रश्य
दार्जिलिंग की पहाड़ियों का
अक्सर  कभी कभी वो पल याद आ जाते हैं जो यादों को झँझोड़ जाते हैं एक प्यारा सा एहसास दे जाते हैं।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

मैं

मैं कुछ इस तरह से रहूं -::

स्वाद की तरह लोगों की यादों मे
नमक की तरह जरूरत बनकर
पानी की तरह घुल -मिल जाऊं
सुख-दुख में 

और दुनिया रहे मेरे आसपास मां की तरह. ---नीलम 

मन

हमें कोई संतुष्ट नहीं कर सकता, मुझे तो लगता है ईश्वर भी नहीं !
 क्योंकि हमारा  मन  भटकता है  सुनता सबकी है पर  करता अपने मन की है!  हम किसी चर्चा में  हो या गोष्ठी  में , सुनते हम ध्यान से हैं और ऐसे लगता है मानो आज से ही हम चर्चित  बात मान लेंगे या फिर उन सुनी बातों को जीवन में उतार  लेंगे लेकिन व्यवहारिक जीवन में आते ही न जाने हमारी सोच को क्या हो जाता है कि गिरगिट भी शरमा जाये  हमारे रंग बदलने की कला से।जीवनयापन, अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने और आगे निकलने की अंधी दौड़ में सब कुछ भूला कर अपने आपको  झोंक देते हैं !