मन तो है मेरा ही पर
मेरे पास नहीं
न जाने कहां भटकता रहता है
जहां चाहे चल देता है
रहूं ताकती इसे सदा
कब यह भटक जाए
कब यह बिगड़ जाए
कब यह सुख लाए
कब यह दुख दे जाए
इसी लिए मुझे अवकाश नहीं,,,,,,चैन नहीं
मेरे पास नहीं
न जाने कहां भटकता रहता है
जहां चाहे चल देता है
रहूं ताकती इसे सदा
कब यह भटक जाए
कब यह बिगड़ जाए
कब यह सुख लाए
कब यह दुख दे जाए
इसी लिए मुझे अवकाश नहीं,,,,,,चैन नहीं
मन को बस में करना बहुत मुश्किल है - प्रशंसनीय प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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