ख़ुशी
मंगलवार, 19 जनवरी 2016
सीख
सुबह बालकनी में चाय पी रही थी कि एक चिड़िया उड़ती चली आई और चीं-चीं करते हुये फुदकने लगी! मैं उसके करतब का मज़ा लेने लगी तभी उसकी चीं चीं तेज़ हो गई, वो इधर से उधर चक्कर काटने लगी मानो कुछ ढूँढ रही हो परेशां होने लगी मैं समझ नहीं पा रही थी क्योंकि मैं मज़े ले रही थी.....मैंने कैमरा हाथों में लिया था ....वो उड़ गई! मैं मायूस हो गई कयोंकि बहुत महत्वपूर्णपल कैमरे से छूट गया था पर पलक झपकते ही वो फिर आ गई और चीं चिल्लाने लगी ध्यान दिया --- वो एक गमले के पास ही चिल्ला रही थी देखा तो पाया नन्हा सा जीव जो शायद २-४ घंटों का ही था मनीप्लांट की बेल में फँस कर रह गया था ! जैसे ही मैंने बेल को खीचं कर उस जीव को निकालने की कोशिश की -- माँ की चिल्लाहट कम हो गई, पर यह क्या:: जीव निष्प्राण था न हिलजुल न आवाज़! माँ भी देखती रह गई..........एक चुप्पी.... ख़ामोशी सी पसर गई..........
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... सोचती रह गई ...... काश ..........कैमरा न ढूँढ कर उस दृश्य को समझने की कोशिश करती.. ........ नन्हें जीव के प्राण बच जाते .... माँ भी दुआयें देती .......
इसी तरह दुर्घटना होने पर दर्शक न बन सहायक बन जायें तो........
... सोचती रह गई ...... काश ..........कैमरा न ढूँढ कर उस दृश्य को समझने की कोशिश करती.. ........ नन्हें जीव के प्राण बच जाते .... माँ भी दुआयें देती .......
इसी तरह दुर्घटना होने पर दर्शक न बन सहायक बन जायें तो........
रविवार, 17 जनवरी 2016
पतंग
आसमान में रंग बिरंगी पतंगें नज़र आ रही थीं---- खुश, मस्त,उन्मुक्त सी उड़ी चली जा रही हवा में पंखफैलाये इधर से उधर पेंच लगाती हुई !पर जैसे ही उसकी डोर खिंचीं :होश आया कि वो एक डोर से बंधी है उसकी डोर किसी के हाथ में है : ढील दी तो पेंच का डर, कसी तो कटने का और यह गई वो गई .....कोई ठिकाना नहीं....या फिर किसी और डोर का साथ ....... पर जानती है -- अंत में कचरे में जानाहै...
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शनिवार, 9 जनवरी 2016
गुरुवार, 31 दिसंबर 2015
नव वर्ष
मान मिले सम्मान मिले,
खुशियों का वरदान मिले.
क़दम-क़दम पर मिले सफलता,
डगर-डगर उत्थान मिले.
सूरज रोज संवारे दिन को,
चाँद मधुर सपने ले आये,
हर पल समय दुलारे आपको
सदियों तक पहचान मिले
Happy New Year 2016
खुशियों का वरदान मिले.
क़दम-क़दम पर मिले सफलता,
डगर-डगर उत्थान मिले.
सूरज रोज संवारे दिन को,
चाँद मधुर सपने ले आये,
हर पल समय दुलारे आपको
सदियों तक पहचान मिले
Happy New Year 2016
गुरुवार, 24 सितंबर 2015
मन
मन तो है मेरा ही पर
मेरे पास नहीं
न जाने कहां भटकता रहता है
जहां चाहे चल देता है
रहूं ताकती इसे सदा
कब यह भटक जाए
कब यह बिगड़ जाए
कब यह सुख लाए
कब यह दुख दे जाए
इसी लिए मुझे अवकाश नहीं,,,,,,चैन नहीं
मेरे पास नहीं
न जाने कहां भटकता रहता है
जहां चाहे चल देता है
रहूं ताकती इसे सदा
कब यह भटक जाए
कब यह बिगड़ जाए
कब यह सुख लाए
कब यह दुख दे जाए
इसी लिए मुझे अवकाश नहीं,,,,,,चैन नहीं
शनिवार, 13 जून 2015
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