ख़ुशी

ख़ुशी

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

बगिया के फूल

📝यादों की कोंपलें फूट आईं हैं
ख़्वाबों की कलियाँ खिलने लगीं हैं 
शाख़ों पर तस्वीरें नज़र आने लगी हैं 
फिर आया मौसम खिलने -खिलाने का
‪#‎बगिया‬ के फूल#

शनिवार, 23 जनवरी 2016

अकेलापन

 📝अक्सर अकेलेपन का बोझ भी बढ़ता ही चला जा रहा था शाम काट खाने को दौड़ती थी ......
जिनका कोई वजूद न था,वो ही हम पर भावी होने लगे !
.... अब तो ; अकेलापन दोस्त बनता जा रहा है! हमें हरतरह के तौर-तरीको से लेकर इंसान  की पहचान तक कराना सिखाने  लग गया है ।
.. देखा
फिर--------
Life में कुछ भी हो सकता है ..
...दीवारें दोस्त हो गई शामें बात करने लगींऔर अकेलापन सलाहकार.....
सलाह यह.... अपना शौक़ पूरा करो ....  सपने बुनो.... यादें संजो डालो ....

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

सर्दी



कुछ दिन पहले सर्दी रानी को निमन्त्रण भेजा था:

हेसर्दी रानी .......कहाँ गुम हो गई तू
न कोई ख़ैर-ख़बर न कोई संदेश
कहाँ छुप गई तू .....ढूढों रे ढूढों.....
न कोहरा न पाला
न भावे धूप, नसुहाये गर्म कपड़े
रज़ाई की गुदगुदी में भी चैन न आवे
दिस्मबर निकला जनवरी आया
पर अबके तू न आई!
याद तेरी बहुत सताये ... मान जा. कुछ दिनों के लिये ही आजा.......
अब स्वागत है सर्दी का::::
हे सर्दी रानी
आ हीं गई
! सुस्वागतम् !
भाव खा रही थी न ...
रहा नहीं गया न...
दनदनाती हुई,मोटा सा बादलों का शॉल ओढ़े हुये,
नाराज़ कर,सूरज को मजबूर होकर आ ही गई हो तो
.......कुछ दिन रह जाना
समय और मौसम की माँग है ........ हम तो क़ायल हैं ही

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

खुशी

खुशी क्या है ----दूसरों को खुश करना या अपनी खुशी
दूसरों की खुशी में ही अपनी खुशी ढूँढीं जा सकती है -कुछ सीमा तक लेकिन किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूँढना थोड़ा मुश्किल है!

सीख

सुबह बालकनी  में चाय पी रही थी कि एक चिड़िया उड़ती चली आई और चीं-चीं करते हुये फुदकने लगी! मैं उसके करतब का मज़ा लेने लगी तभी उसकी चीं चीं तेज़ हो गई, वो इधर से उधर चक्कर काटने लगी मानो कुछ ढूँढ रही हो परेशां होने लगी मैं समझ नहीं पा रही थी क्योंकि मैं मज़े ले रही थी.....मैंने कैमरा हाथों में लिया था ....वो उड़ गई! मैं मायूस हो गई कयोंकि बहुत महत्वपूर्णपल कैमरे से छूट गया था पर पलक झपकते ही वो फिर आ गई और चीं चिल्लाने लगी ध्यान दिया --- वो एक गमले के पास ही चिल्ला रही थी देखा तो पाया नन्हा सा जीव जो शायद २-४ घंटों का ही था मनीप्लांट की बेल में फँस कर रह गया था ! जैसे ही मैंने बेल को खीचं कर उस जीव को निकालने की कोशिश की -- माँ की चिल्लाहट कम हो गई, पर यह क्या:: जीव निष्प्राण था न हिलजुल न आवाज़! माँ भी देखती रह गई..........एक चुप्पी.... ख़ामोशी सी पसर गई..........
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... सोचती रह गई ...... काश ..........कैमरा न ढूँढ कर उस दृश्य को समझने की कोशिश करती.. ........ नन्हें जीव के प्राण बच जाते .... माँ भी दुआयें देती .......
इसी तरह दुर्घटना होने पर दर्शक न बन सहायक बन जायें तो........

रविवार, 17 जनवरी 2016

पतंग

आसमान में रंग बिरंगी पतंगें नज़र आ रही थीं---- खुश, मस्त,उन्मुक्त सी उड़ी चली जा रही हवा में पंखफैलाये इधर से उधर पेंच लगाती हुई !पर जैसे ही उसकी डोर खिंचीं :होश आया कि वो एक डोर से बंधी है उसकी डोर किसी के हाथ में है : ढील दी तो पेंच का डर, कसी तो कटने का और यह गई वो गई .....कोई ठिकाना नहीं....या फिर किसी और डोर का साथ .......  पर जानती है -- अंत में कचरे में जानाहै...
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लेकिन उससे पहले आसमान छू लूँ 

शनिवार, 9 जनवरी 2016

सर्दी

हे सर्दी रानी .......कहाँ गुम हो गई तू 
न कोई ख़ैर-ख़बर न कोई संदेश
कहाँ छुप गई तू .....ढूढों रे ढूढों.....
न कोहरा न पालान भावे धूप, नसुहाये गर्म कपड़े 
रज़ाई की गुदगुदी में भी चैन न आवे 
दिस्मबर निकला जनवरी आया
पर अबके तू न आई!
याद तेरी बहुत सताये ... मान जा. कुछ दिनों के लिये ही आजा........