ख़ुशी

ख़ुशी

सोमवार, 4 अगस्त 2014

बारिश की बूंदे



बारिश  की बूंदे झूम -झूम के बरस रही हैं
 मिज़ाज़ आसमाँ  का बदला
रुत ने भी रुख बदला  
 नई फ़िजा है आई,
 धरती फिर से महकी -सजी- सवँरी है !

 बारिश  की बूंदे तन -  मन  को भी भिगोने लगी 
मन मचलने लगा है--- भीगने को

आस बढ़ने लगी  है
प्यास  बढ़ने लगी  है --पिया मिलन को

पर  ये   क्या -----

गिरती हुई बूंदों पर नज़र डाली 
.ये बूंदे तो आंसू  हैं ,बरसते मोती 
--------मूल्य है इनका बेहपनाह
दिल घबरा सा गया  
मौसम के बहाने 
दिल में बिजली दौड़ी थी 

पर यह आंसू तन - मन  को  भिगो गए !!!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें